कहानी - सोने की सजा
--------------------कहानीकार - शैलेंद्र कुमार मिश्र
रात की तीन बजे सुधीर की नींद टूटी ,तो उसने सोचा अभी थोड़ा और सो ले। यह सोच उसने सर्द कोहरे से भरी रात में रजाई में मुंह छुपा लिया अचानक जब उसकी और खुली तो घड़ी में देखा 3:30 बज रहे थे। हड़बड़ा कर उसने जल्दी से कपड़े पहने, पास में सोती जानकी ,जो उसकी पत्नी थी ,सो रही थी ।
उसे जगाते हुए कहा--
" अरे जानकी!उठो दरवाजा बन्दकर लो।"
जानकी उस समय गहरी नींद में सो रही थी । सुधीर ने जूता पहनते उसे जगाते हुए कहा-
अरे जानकी,उठो दरवाजा बंद कर लो।
" अरे जानकी!उठो दरवाजा बन्दकर लो।"
जानकी उस समय गहरी नींद में सो रही थी । सुधीर ने जूता पहनते उसे जगाते हुए कहा-
अरे जानकी,उठो दरवाजा बंद कर लो।
जानकी उस समय गहरी नींद में सो रही थी । सुधीर ने जूता पहनते हुए उसे जगाया-
"अरे यार उठो , मैं जा रहा हूं। .... देर हो रही है । " जानकी जम्हाई लेती हुई जल्दी से उठ बैठी और बोली-
"चना रखे बैग में?"
"अरे यार उठो , मैं जा रहा हूं। .... देर हो रही है । " जानकी जम्हाई लेती हुई जल्दी से उठ बैठी और बोली-
"चना रखे बैग में?"
सुधीर के इनकार करने पर वह पालथीन में थोड़ा भीगा चना भरकर लाई , सुधीर को रास्ते में खाने हेतु । चना सुधीर को बड़े प्रिय थे ।गाड़ी के लेट रहने अथवा भूख लगने पर वह उसे खा लेता था।
भीगे चने लेकर सुधीर जल्दी से घर से निकल पड़ा, गाड़ी पकड़ने खातिर स्टेशन की ओर ।ऑटो पकड़ कर वह रेलवे स्टेशन पर आया ।गाड़ी तैयार थी थोड़ी देर में ट्रेन चल पड़ी।
सुधीर जहां नौकरी करता था, पहले अपने परिवार के साथ वह रहता था। मगर पिछले वर्ष से पत्नी जानकी की नौकरी सरकारी स्कूल में लग जाने के कारण वह भागदौड़ करने पर मजबूर हो गया ।अब वह जानकी के शहर से अपने दफ्तर रोज गाड़ी से आता जाता है ।कभी कभार रुक भी जाता है ,क्योंकि जिस मकान में सुधीर परिवार लेकर पहले रहता था, उस मकान का हजारों रुपया और अपने दफ्तर के पास के मकान का-- दोनों जगहों का किराया देना पड़ता था।
दफ्तर के पास किराया का मकान होने पर भी अकेले रहने में जैसे उसका दम घुटता था, वही घर जो बच्चों ,परिवार वालों के साथ बड़ा ही अच्छा लगता था.अब अकेले कदम रखने का उसमें मन नहीं करता था । भले ही इस खातिर सुधीर को रात में आना-जाना ,रास्ते की मुसीबतें झेलनी पड़ती थीं... खाने पीने में दिक्कतें होती थी , लेकिन यह सब कुबूल था सुधीर को ! बस उसे अच्छा लगता था परिवार में थोड़ी देर के लिए ही सही पहुंचकर!
आज सुबह गाड़ी पर बैठते समय उसने अखबार वाले से एक पेपर खरीदा। गाड़ी पर बैठकर थोड़ी देर उसे उलटता- पुलटता रहा और फिर स्लीपर की बर्थ पर सोने के मूड से लेट गया। रास्ते में जग कर वह अपने मुकाम के बारे मे दो एक बार नीचे बैठे लोगों से पूछता रहा, लेकिन जब उसकी नींद खुली ...तो देखा उसका दफ्तर का मुकाम तो पीछे छूट गया था ,गाड़ी आगे बढ़ चुकी थी। उसके साथ उतरने वाले एक आयुर्वेदिक चिकित्सक भी सो जाने के कारण ट्रेन से उतर नहीं पाए थे वह भी सो गए थे ।
उन्होंने भी पछताते हुए कहा-
""भाई साहब ! आपको भी पीछे स्टेशन पर उतरना था क्या?"
सुधीर ने पछताते हुए नींद लग जाने के कारण ,अपने को कोसते हुए अफसोस जताते कहा कि--
"क्या बताएं भाई साहब! ऐसा कभी होता नहीं था; इतना बेसुध होकर मैं कभी सोता नहीं था।"
डॉक्टर साहब भी परेशान थे ।हम दोनों को परेशान देखकर लोगों ने कहा-
"अरे साहब !अगले स्टेशन पर उतर लीजिएगा ।उधर से दूसरी गाड़ी आती होगी!"
ऐसा जानकर सुधीर और डॉक्टर साहब को थोड़ा तसल्ली हुई अगले स्टेशन पर उतरने पर मालूम हुआ कि दूसरी आने वाली गाड़ी घंटों लेट है। लेकिन थोड़ी देर इंतजार करना ही मजबूरी थी। कोहरे के कारण गाड़ी आने में देरी जानकर डॉक्टर और सुधीर साहब ने चाय पीने का प्रोग्राम बनाया ।दोनों स्टेशन के पास ही जलेबी और घुघरी खाने पर जुट गए । चाय की चुस्की ली और घंटे भर बाद पूछने पर मालूम हुआ गाड़ी 2 घंटे और लेट हो गई है।
कई गाड़ियों की क्रॉसिंग के बाद गाड़ी जब आई तो दोपहर के 12:00 बज रहे थे । इतनी मशक्कत के बाद भी समय से न पहुंच पाने के कारण सुधीर को उस दिन सो जाने की सजा मिली, दफ्तर से दिनभर की छुट्टी लेने के रूप मे। सुधीर उदास, खिन्न मन से आने वाली गाड़ी पर बैठ रहा था, दफ्तर जाने के लिए नहीं....घर वापसी के लिए !
––---------शैलेंद्र कुमार मिश्र
प्रधानाचार्य(कार्यवाहक)
सेन्ट थॉमस इंटर कालेज,शाहगंज
जौनपुर, उत्तर प्रदेश,
संपर्क----8795910427
( ९४५१५२८७९६).

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