राणा सांगा (जीवनी) का जीवन परिचय
राणा सांगा नाम, एक महाराज, जिसने मेवाड़ की राजनीति में और उसके साम्राज्य को बढ़ाने में अपने सर्वस्य का निर्वाहन किया। राणा सांगा का पूरा नाम महाराणा संग्राम सिंह था. उन्होंने 1448 में जन्म लिया और 17 मार्च 1527 को वीरगति को प्राप्त हुए.
राणा सांगा जी उदयपुर में सिसोदिया राजपूत राजवंश के महान राजा थे. किंतु वह अपने पिता राजा रायमल के सबसे छोटे पुत्र थे. राजा रायमल की कुल 3 पुत्र थे जिसमें से पहले कुंवर पृथ्वीराज, जगमाल और फिर राणा सांगा थे.
सबसे छोटे होने के कारण राजा रायमल की तीनों पुत्रों के बीच लगातार आपसी खींचातानी होती रहती थी. इसी खींचातानी के कारण कुंवर पृथ्वीराज और जगमाल ने राणा सांगा को मारने की कोशिश भी की. जिससे कि वह मेवाड़ के सिंहासन को प्राप्त कर सकें। इसके ऊपर एक कहानी राजा और सर्प का रहस्य हमने पहले ही बता रखी है कृपया उसे जरूर देखें।
सबसे छोटे होने के कारण राजा रायमल की तीनों पुत्रों के बीच लगातार आपसी खींचातानी होती रहती थी. इसी खींचातानी के कारण कुंवर पृथ्वीराज और जगमाल ने राणा सांगा को मारने की कोशिश भी की. जिससे कि वह मेवाड़ के सिंहासन को प्राप्त कर सकें। इसके ऊपर एक कहानी राजा और सर्प का रहस्य हमने पहले ही बता रखी है कृपया उसे जरूर देखें।
मेवाड़ के सिंहासन में राणा सांगा का महत्व (Rana Sanga Jivani)
मेवाड़ के इतिहास में, सिंहासन किल्ली संघर्ष बहुत पहले ही शुरू हो चुका था. इसका जीता जागता सबूत, एक भविष्य कर्ता के अनुसार सांगा को मेवाड़ का शासक बनाया जाने के पीछे एक सबसे बड़ी स्थिति ऐसी थी. जब पृथ्वीराज और जगमाल, अपने भाई राणा सांगा को जान से मारना चाहते थे. वह भी सिर्फ मेवाड़ के सिंहासन के लिए.
किंतु राणा सांगा ने अद्भुत प्रदर्शन करते हुए, अजमेर के करमचंद पवार की सहायता से मेवाड़ का साम्राज्य स्थापित किया और उसे 27 सालों तक अभिरक्षा लाया भी. महाराणा सांगा एक ऐसे राजा थे जो कि राजपूती शान को काफी मानते थे. इसी के साथ राजपूतों और अन्य राज्यों को संगठित किया। जिससे सभी राजपूत एक साथ ही क्षेत्र के नीचे आए. जिससे उनको हराना लगभग नामुमकिन सा हो गया था। इसी के कारण राणा सांगा ने अनेक राजाओं और अनेक मुगल शासकों को हराया और शानदार जीत प्राप्त की।
किंतु राणा सांगा ने अद्भुत प्रदर्शन करते हुए, अजमेर के करमचंद पवार की सहायता से मेवाड़ का साम्राज्य स्थापित किया और उसे 27 सालों तक अभिरक्षा लाया भी. महाराणा सांगा एक ऐसे राजा थे जो कि राजपूती शान को काफी मानते थे. इसी के साथ राजपूतों और अन्य राज्यों को संगठित किया। जिससे सभी राजपूत एक साथ ही क्षेत्र के नीचे आए. जिससे उनको हराना लगभग नामुमकिन सा हो गया था। इसी के कारण राणा सांगा ने अनेक राजाओं और अनेक मुगल शासकों को हराया और शानदार जीत प्राप्त की।
राणा सांगा एक व्यक्तित्व (History of Maharana Sanga)
राणा सांगा सिसोदिय जो कि एक राजपूती और राजवंशी थे. उन्होंने विदेशी आक्रमणकारियों के विरुद्ध सभी राजपूतों को एक साथ लेकर आए और सभी को एकत्रित करके विदेशी आक्रमणकारियों को दूर भगाया। हालांकि वह अपने आखिरी समय में एक विश्वासघाती मंत्री के कारण, जिसने कि उन्होंने विश दे दिया, उसकी कारण वीरगति को प्राप्त हुए और युद्ध हरा. लेकिन फिर भी उन्होंने अपनी पूरी जीवन पर्यंत, अपनी वीरता, उदारता और शौर्य को प्रदर्शित करते हुए पूरे विश्व जगत को प्रेरित किया।
जब राजा रायमल के बाद, 1901 में राणा सांगा जब मेवाड़ के उत्तराधिकारी बने, तो उन्होंने दिल्ली, गुजरात, मालवा राजस्थान और अन्य कई जगहों पर, जहां पर मुगल बादशाहों ने आक्रमण करने की कोशिश की। उन्होंने वहां पर अपने राज्य की सुरक्षा पूरी बहादुरी और पूरी वीरता के साथ कि। उनकी वीरता की कहानी इसी से ज्यादा चलती है, उन्होंने अपने पूरे जीवन काल में अपनी एक आंख, अपनी एक भुजा को गवा दी। किंतु फिर भी उन्होंने मुगल शासकों के सामने और अंग्रेजों के सामने हार नहीं मानी। इन्हीं के ऊपर एक कविता जिसे राणा सांगा कविता कहते हैं लिखी गई है:
मेवाड़ का सिंहासन कविता
अस्सी घाव लगे थे तन पर!
फिर भी व्यथा नहीं थी मन में!!
#जय मेवाड़!
इस कविता में, राणा सांगा की महान व्यक्तित्व को दर्शाते हुए बताया गया कि, उनके पूरे शरीर पर तकरीबन 80 से ज्यादा घाव लगे थे। जिससे उनका पूरा शरीर छलनी छलनी हो गया था। किंतु फिर भी वह मेवाड़ के साम्राज्य को आगे बढ़ाने एवं उसकी रक्षा के लिए तत्पर थे।
वीरता के परिपूर्ण महाराणा संग्राम सिंह
क्या आप सोच सकते हैं कि, वह दृश्य कैसा रहा होगा। जब एक राजा जो कि, अपने शरीर पर सैकड़ों घाव होने के बावजूद, जिसकी एक आंख 1, हाथ, एक पैर और कान और शरीर के अन्य अंगों ग्रस्त हैं। फिर भी जब वह तलवार लेकर के लड़ने जाता था। उसकी तलवार ऐसा बताया जाता है कि वह तकरीबन 20 किलो की होती थी। तो उस समय का वीरता पूर्ण और जज्बे भरा माहौल कैसा होगा।
साम्राज्य का विश्वास [Mewar Ki History - राणा सांगा (मेवाड़ राजवंश )]
एक राजा का परम कर्तव्य होता है कि, उसकी जनता उस पर पूरा विश्वास करें। यह चीज राणा सांग के साथ, उनके जीवन पर्यंत जुड़ी रही। उन्हें ना कोई योद्धा दुश्मन में मार सका, ना ही कोई उन्हें हराने की कोशिश कर सका। किंतु उनकी मृत्यु एक विश्वासघाती के कारण हुई, तो इसका कोई क्या कर सकता है। इसीलिए उस साम्राज्य में जब उस विश्वासघाती ने कदम रखा। तो उसके शरीर के तकरीबन 1000 से ज्यादा टुकड़े मिले, जो कि वहां की जनता न कर डाले थे।
आइए जानते हैं कैसे थे यह मेवाड़ी राजा और क्या-क्या थी इनकी मृत्यु के पीछे तथ्यों की वजह और खानवा के युद्ध के बारे में भी समझने की कोशिश करते हैं:
आइए जानते हैं कैसे थे यह मेवाड़ी राजा और क्या-क्या थी इनकी मृत्यु के पीछे तथ्यों की वजह और खानवा के युद्ध के बारे में भी समझने की कोशिश करते हैं:
राणा सांगा परिचय
हालांकि राणा सांगा का परिचय, जब हम छोटे रहे होंगे तो, हमने किसी ने किसी किताब में या किसी कहानियां किसी कविता में हमें जरूर पड़ी होगी। फिर भी यह बताने के लिए काफी जरूरी है कि राणा सांगा 1509 से लेकर के 1527 तक उन्होंने राजस्थान मेवाड़ का संचालन किया। उन्होंने दिल्ली, गुजरात, मालवा और कई सारे बादशाहों से अपने राज्य के सुरक्षा की। अपनी जनता को एक शक्तिशाली राज्य और समृद्ध राज्य प्रदान किया। जिसके कारण, उस समय अपने किलों के लिए जाना जाता था। वह पूरे हिंदुस्तान में सर्वोच्च ऊंचाई पर था। एक आदर्श राजा की तरह उन्होंने अपना सर्वस्व देकर की भी मेवाड़ की सुरक्षा एवं शांति के लिए जीवन निर्वहन किया।
राणा सांगा की रोचक युद्धों का इतिहास (Bharat Ek Khoj Story)
मेवाड़ यानी कि राजस्थान, पूरी तरीके से रेतीला और मरुस्थल इलाका, जोकि दिल्ली, मालवा और अलग मुगल सल्तनत के राज्य से घिरा हुआ था।
जिस पर हर वक्त कोई ना कोई अपना साम्राज्य स्थापित करने के लिए आक्रमण करने की कोशिश में रहता था। उस वक्त दिल्ली पर सिकंदर लोदी और गुजरात में महमूद शाह और मालवा में नसीर उद्दीन खिलजी सुल्तान के रूप में स्थापित थे।
तीनों ने अलग-अलग तरीके से अलग-अलग बार हमले कर करके कोशिश की। कि वह मेवाड़ का राज्य स्थापित कर सकें। किंतु वह एक बार भी नहीं जीत सके। इसके बाद उन तीनों ने सम्मिलित होकर के एक बार पूरी शक्ति, महाराणा सांगा पर हमला करने की कोशिश की। किंतु फिर भी जीत राणा सांगा की ही हुई।
जिस पर हर वक्त कोई ना कोई अपना साम्राज्य स्थापित करने के लिए आक्रमण करने की कोशिश में रहता था। उस वक्त दिल्ली पर सिकंदर लोदी और गुजरात में महमूद शाह और मालवा में नसीर उद्दीन खिलजी सुल्तान के रूप में स्थापित थे।
तीनों ने अलग-अलग तरीके से अलग-अलग बार हमले कर करके कोशिश की। कि वह मेवाड़ का राज्य स्थापित कर सकें। किंतु वह एक बार भी नहीं जीत सके। इसके बाद उन तीनों ने सम्मिलित होकर के एक बार पूरी शक्ति, महाराणा सांगा पर हमला करने की कोशिश की। किंतु फिर भी जीत राणा सांगा की ही हुई।
Battle of Khanwa 1527, Rana Sanga vs Mughal king Babur
सुल्तान इब्राहिम लोदी से, जब सीमा पर खतौली के मैदान में युद्ध हुआ। जो कि 1517 का था, इस युद्ध में इब्राहिम लोहित लोधी पराजित हो गया। वह भाग गया। इस युद्ध में महाराणा की एक आंख तो चली गई थी, साथ ही साथ उनका बाया हाथ भी तलवार से कट गया था। इसी युद्ध में उनके पांव में कई घटनाओं में तीर लगे जिससे कि वह लंगडी भी हो गए।
- अपने शरीर की लगातार क्षति के बावजूद भी राणा सांगा ने गुजरात के सुल्तान मुजफ्फर को लड़ाई में अहमदनगर और विलास नगर में हराया। अपने अपमान का बदला लिया। इसके स्वरूप उन्होंने जब वह राज्य जीता तो वहां के सामान रायमल राठौर को वहां की गद्दी पर बैठा दिया.
- इस युद्ध में हार के बाद, अहमदनगर के किले में जाकर रहने लगा और वहां पर उसने यह कोशिश की कि कोई और सुल्तान आए। फिर वह उसकी मदद से महाराणा के ऊपर, फिर से हमला करें।
- महाराणा ने इस चीज को समझा और उन्होंने मुगलों के ऊपर हमला कर दिया। मुगलों ने किले के दरवाजे को बंद कर के ऊपर से लड़ाई शुरु कर दी। जिससे महाराणा की सेना को अंदर आने का मौका नहीं मिल रहा था।
महाराणा सांगा के युद्ध
- इस युद्ध में महाराणा का एक नामी सरदार डूंगर सिंह चौहान। जो कि बांगड़ नाम से जाना चाहता था। वह बहुत पूरी तरह से घायल हो गया। लगभग मरने की कगार पर था। इस युद्ध में उसकी कई बेटे भी मारे गए। डूंगर सिंह के पुत्र कान्हा सिंह ने बड़ी वीरता दिखाई और उसने देखा कि वह और उसके पिता दोनों अपने अंतिम समय में है।
- उसी समय मुगलों की किले के दरवाजे बंद थे, वह दरवाजे लोहे के बने हुए थे। उन दरवाजों पर तीखे भाले लगे हुए थे। जिसके कारण जब हाथी किवाड़ तोड़ने की कोशिश करते थे। तो घायल हो जाते थे और तोड़ भी नहीं पाते थे।
- इसी बात को ध्यान में रखते हुए कान्हा सिंह ने भालू के आगे अपने आप को खड़ा कर दिया और महावत को हाथी को चलाने को कहा इस पर जब हाथी ने आगे बढ़ाएं अपने कदम बढ़ाए। तब कान्हा सिंह तोमर गए। किंतु वह केवल झूठ गई, इस घटना से मेवाड़ी सेना में इतना जोश आया कि वे अपनी-अपनी नंगी तलवारें लेकर घुस गए। राणा सांगा और बाबर का युद्ध हुआ और राणा जी जीत गए.
राणा सांगा का मीराबाई से संबंध
राणा सांगा के बड़े बेटे का नाम भुज राजस्थान। जैसा कि हम सब जानते हैं कि राणा सांगा की कुल 27 पत्नियां थी। इस प्रकार से जमाना के बड़े बेटे भोजराज का विवाह मेड़ता के वीरमदेव के छोटे भाई रतन सिंह की पुत्री मीराबाई के साथ हुआ। तो मीराबाई मेड़ता की राह दद्दा के चतुर्थ पुत्र रतन सिंह की पुत्री थी।
मीराबाई की मां का देहांत बचपन में ही हो गया था। उनका अगल-बगल भी, किसी भी प्रकार के नाते रिश्तेदारों से कोई संबंध नहीं था। जिसके कारण मीराबाई कृष्ण की ध्यान में लग गई थी। इस प्रकार जब शादी के बाद भी मीराबाई ने अपनी संकल्पित भक्ति और भजनों से भगवान का नाम लेना शुरू किया।
तो उनकी ख्याति दूर-दूर तक पहुंच गई। अब विश्व के कोने-कोने से विदेशी और देसी साधु संत मिलने आया करते थे। उनकी इसी प्रसिद्धि के कारण और बैरागी के कारण महाराणा विक्रमादित्य। उनसे हमेशा ऑपरेशन रहा करते थे। उन पर अलग-अलग तरह के अत्याचार किया करते थे। कई बार तो उन्होंने मीराबाई को मरवाने के लिए देने तक का प्रयोजन भी किया। किंतु वह सफल नहीं हो पाए, ऐसी स्थिति देखकर के जब राणा सांगा ने मीराबाई को एक सुरक्षित स्थान प्रदान करने का निर्णय लिया। तो मीराबाई ने उन्हें अपना रक्षा पति मान लिया।
तो उनकी ख्याति दूर-दूर तक पहुंच गई। अब विश्व के कोने-कोने से विदेशी और देसी साधु संत मिलने आया करते थे। उनकी इसी प्रसिद्धि के कारण और बैरागी के कारण महाराणा विक्रमादित्य। उनसे हमेशा ऑपरेशन रहा करते थे। उन पर अलग-अलग तरह के अत्याचार किया करते थे। कई बार तो उन्होंने मीराबाई को मरवाने के लिए देने तक का प्रयोजन भी किया। किंतु वह सफल नहीं हो पाए, ऐसी स्थिति देखकर के जब राणा सांगा ने मीराबाई को एक सुरक्षित स्थान प्रदान करने का निर्णय लिया। तो मीराबाई ने उन्हें अपना रक्षा पति मान लिया।
राणा सांगा की मृत्यु का रहस्य (बिना आँख, हाथ और पैर के युद्ध करने वाले योद्धा)
खानवा की युद्ध में, जब राणा सांगा युद्ध करते वक्त, एक तीर उनके चेहरे पर आकर लगा। जिससे महाराणा घायल हो गए। इसी कारण वहां के एक सैनिक ने उनकी स्थिति को समझते हुए। उन्हें मूर्छित अवस्था में युद्ध स्थल से किनारे कर लिया और मुकुट पहनकर खुद युद्ध करने लगा।
इस युद्ध में उसे वीरगति को प्राप्त हुई और राणा की सेना भी हार गई। किंतु जब युद्ध जीतने की खबर बाबर तक पहुंची। तब बाबर ने मेवाड़ी सेना के सभी कटे हुए सिरों की मीनार बनवाई। लेकिन जब राणा सांगा को होश आया। होश आने के बाद उन्हें पता चला कि वह रणभूमि से दूर आ गए थे। तो बहुत ही क्रोधित हुए, उन्होंने कहा कि मैं हार कर चित्तौड़ वापस नहीं जा सकता। मैं अपनी बची खुची सेना को एकत्रित करूंगा।
फिर से आक्रमण करने की योजना बना लूंगा। इसी बीच उनकी एक विश्वासपात्र ने स्थिति को समझते हुए, उनकी भोजन में विश्व बना दिया जिससे उनकी मृत्यु हो गई।
इस युद्ध में उसे वीरगति को प्राप्त हुई और राणा की सेना भी हार गई। किंतु जब युद्ध जीतने की खबर बाबर तक पहुंची। तब बाबर ने मेवाड़ी सेना के सभी कटे हुए सिरों की मीनार बनवाई। लेकिन जब राणा सांगा को होश आया। होश आने के बाद उन्हें पता चला कि वह रणभूमि से दूर आ गए थे। तो बहुत ही क्रोधित हुए, उन्होंने कहा कि मैं हार कर चित्तौड़ वापस नहीं जा सकता। मैं अपनी बची खुची सेना को एकत्रित करूंगा।
फिर से आक्रमण करने की योजना बना लूंगा। इसी बीच उनकी एक विश्वासपात्र ने स्थिति को समझते हुए, उनकी भोजन में विश्व बना दिया जिससे उनकी मृत्यु हो गई।
राणा सांगा बलिदान दिवस
महान राजस्थानी संग्राम सेनानी महाराणा सांगा जी का बलिदान दिवस, 30 जनवरी 1528 को माना जाता है। यह दिवस राजस्थान के इतिहास में अमर और उल्लेखनीय है। यह दिन हमें महानता और साहस का एहसास दिलाता है।
राणा सांगा की समाधि दौसा जिले के बांदीकुई के बसवा तहसील के पास है. जब राणा सांगा को तीर लगा तब राणा सांगा को बसवा के पास लेकर आए थे, जहां राणा सांगा ने अंतिम सांस ली। वह समाधि स्थल आज भी वही पर स्थित है।
जानतें है कुछ राणा सांग के परिवार की और रोचक बातें:
राणा सांगा की पत्नी (Rani Karnavati - Wife of Rana Sanga)
रानी कर्णावती जी बूंदी, राजस्थान की राजकुमारी और राणा सांग की पत्नी थी। जब वह राणा सागा (चित्तौरगढ़ के महाराज) से शादी की तो वह मेवाड़ की रानी बनी और वह की जनता का एक माँ की तरह ध्यान रखा।
राणा सांगा के पुत्र चार पुत्र थे। जिनमें से रानी कर्णावती से दो पुत्र हुए, जिनका नाम राणा विक्रमादित्य और राणा उदय सिंह हुआ। वह महान महाराणा प्रताप की दादी थी।
राणा सांगा की माता का नाम
राणा सागा जी के पिता का नाम महाराणा रायमल्ल था। जिसे काफी जानते है, किन्तु राणा सागा की माता का नाम महारानी रतन कंवर था। यह कुछ ही लोग जानते है, अपनी माँ का राणा पर काफी प्रभाव था। इसका उल्लेख राजस्थान के इतिहास में भी है।
राणा सांगा के पुत्र का क्या नाम था?
- भोजराज (मीराबाई के पति)
- विक्रमादित्य
- महाराणा उदयसिंह
इसी प्रकार के जीवन परिचय नीचे दिए गए है:





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