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सूरदास जीवनी - भक्ति भावना, पुस्तकें

सूरदास जीवनी - विवाह, भक्ति भावना, पुस्तकें तस्वीरें

सूरदास का जीवन परिचय हिंदी में आपका स्वागत है

सूरदास का नाम आते ही हम भक्ति भावना में डूब जाते हैं सूरदास जी वात्सल्य रस के सम्राट हैं और हमेशा से उन्होंने अपने श्रृंगार और शांत रसों की बड़ी ही परिकल्पना के साथ अपने छंदों एवं काव्य में वर्णन किया है सूरदास जी को कृष्ण का सबसे बड़ा भक्त और उसके वात्सल्य रस को प्रकट करने वाला सबसे बड़ा सम्राट बोला जाता है आइए जानते हैं उनके बारे में

सूरदास जी का जन्म और प्रारंभिक जीवन

सूरदास जी 1498 ईस्वी में रनकता नामक गांव में जन्मे थे यह गांव मथुरा आगरा के बीच स्थित है कई लोगों का यह भी मत है कि सूरदास जी का जन्म से ही नामक गांव में हुआ था और वह अत्यंत ही गरीब ब्राह्मण परिवार से आते थे बाद में सूरदास जब बड़े हुए तो आगरा और मथुरा के बीच गांव घाट पर आकर रहने लगे ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि सूरदास के पिता रामदास जी अपने कार्य एवं कुशलता से गायक थे

सूरदास की सबसे बड़ी कमजोरी उनका जन्मांध होना था सूरदास जी बचपन से ही अंधे थे इसी कारण उन्हें कई सारी अपेक्षा और उपेक्षा ओं का सामना करना पड़ता था इसीलिए जब वह बचपन में ही वल्लभाचार्य के शिष्य बने और उनसे रिक्शा लेकर के कृष्ण लीला जी के पद गाने लगे आगरा के समीप जब गांव घाट पर रहते थे तो कई लोग उनके पास कृष्ण के पद गाने और सुनने के लिए आने लगे इसीलिए सूरदास जब कृष्ण भक्ति में किसी भी लीला का बखान करते थे तो वह वात्सल्य रस की मार्मिक कथाएं और मार्मिक प्रसंग होते थे

ब्रजभाषा के सबसे श्रेष्ठ कवि महात्मा सूरदास

कहते हैं व्यक्ति जब अपनी कुशलता में एकदम पारंगत हो जाए और उस में लीन हो जाए तो वह महात्मा और महानता का दर्जा प्राप्त कर लेता है इसीलिए हिंदी साहित्य में भगवान श्री कृष्ण के उपासक के रूप में और ब्रजभाषा के सबसे श्रेष्ठ कवियों में महात्मा सूरदास जी का हिंदी साहित्य में सबसे बड़ा योगदान माना जाता है

 सूरदास जी के जीवन परिचय में यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा यह एक ऐसे पंडित थे जो बचपन से ही संगीत प्रेमी थे और कृष्ण की लीलाओं का ज्ञान और गुणगान करते हुए विश्व लोकप्रिय हो गए

सूरदास जी का बचपन और उनका नाम
सूरदास जी बचपन में जब उनका नाम मदन मोहन था तो अत्यंत सुंदर और कुशल बुद्धि वक्ता थे जब भी वह नदी के किनारे जाते वहां पर बैठने के बाद वह जरूर कुछ ना कुछ गीतों का सृजन करते थे 1 दिन ऐसा हुआ कि जब उन्होंने लोगों के मन को मोह लिया एक समय जब एक सुंदर युवती नदी के किनारे स्नान कर रही थी और कपड़े धो रही थी मदन मोहन जी का ध्यान उनकी तरफ चला गया यह कहानी सूरदास जी के जीवन की सबसे बड़ी कहानियों में से एक है उस वक्त जब उस व्यक्ति ने मदन मोहन को अपनी कामुक नजरों से देखा तो सूरदास कविता लिखना भूल गए और अपना पूरा एक तक लगाकर उस स्थिति को देखने लगे उन्हें ऐसा लगा यमुना के किनारे कृष्ण की प्रेमिका राधिका स्नान कर रही हो और बैठक बैठकर उन्हें देख रही हो वह स्वयं को कृष्ण और उसने व्यक्ति को राधा समझ बैठे थे

लगातार उस युवती को देखने के कारण मदन मोहन जी के पास आई और पूछा कि आप सुंदर कविता लिखने वाले मदन मोहन जी ही हो इस पर सूरदास ने मुस्कुराते हुए कहा हां मैं मदन मोहन यानी सूरदास जी हूं मैं कृष्ण की कथाएं और उनकी गीत लिखता हूं लेकिन जब मैंने आपको देखा तो मुझे ऐसा लगा कि मुझे मेरी राधा मिल गई उसने उसने पूछा आप इतनी सुंदर हो आपको क्या मुझसे सुंदर कन्या नहीं मिलती इस पर सूरदास ने बहुत ही सुंदर जवाब दिया उन्होंने कहा मैं तो बचपन से ही अंधा हूं आपकी प्यारी सुगंध और मुस्कुराहट ही मैं मंत्रमुग्ध हो चुका हूं आप बहुत ही सुंदर हैं इस पर युवती ने कहा हां मैं सुंदर हूं लेकिन यह आपको कैसे पता उन्होंने कहा कृष्ण जी मुझे इस बात का ज्ञान देते हैं कि कौन कैसा है मैं सिर्फ आपकी वाणी और आपके सुगंध से ही बता सकता हूं कि आप कैसी हैं

 इस प्रकार कई दिनों तक आपस में बातचीत कई दिनों तक चली किंतु जब यह बात मदनमोहन यानी सूरदास जी के पिता को चली तो उन्हें बहुत ही गुस्सा आया उन्होंने इस पर सूरदास जी को घर छोड़ देने का आदेश दिया हालांकि इस पर सूरदास को सुंदर युवती का चेहरा उनके सामने से नहीं जा रहा था किंतु जब वह 1 दिन मंदिर में बैठे थे तभी वहां पर एक सुंदर शादीशुदा स्त्री आई इस बार मदन मोहन उसके पीछे पीछे चल दिए और जब घर पहुंचे तो उस युवती के पति ने उसका दरवाजा खोला और पूरे सम्मान के साथ उन्हें घर के अंदर खाना पीना खिलाया और अंदर बिठाया मदन मोहन ने अपनी सादर सत्कार से इतनी मंत्रमुग्ध हुए और अपने आने का कारण बताया तो उसी वक्त उन्होंने दो जलती हुई सिलिया मंगवाई और साथ ही साथ उसी वक्त उसको अपनी आंखों में डाल लिया इसी कारण मदन मोहन बन गए महान कवि सूरदास


 इसीलिए कहा  गया है कि हर सफल व्यक्ति के पीछे एक स्त्री का हाथ होता है तो कोई गलत नहीं है इसी प्रकार से तुलसीदास जब अपनी पत्नी का साथ और वैराग्य छोड़ा तब वह महान बन गए और उसी प्रकार से जब सूरदास ने उस ज्योति का ध्यान लगाना छोड़ दिया तभी से वह महान सूरदास के रूप में विख्यात हुए

सूरदास की जन्म स्थिति के विषय में मतभेद

 सूरदास जी के जन्म स्थान के लिए कई सारे मतभेद सामने आते हैं लेकिन जब साहित्य लहरी में सूरदास की स्वयं लिखी रचना में या पद मिलता है जिसमें कहा गया है
 मुनि अपनी रस के लेख दर्शन गौरी नंद को लिखी  सूअर संवत पिक

सूरदास जी के गुरु गुरु वल्लभाचार्य हमेशा से ही उनके मार्गदर्शक रहे उन्होंने जिस प्रकार से ज्ञान दिया वही ज्ञान उन्होंने अपने पूरे जीवन पर्यंत लोगों के बीच में प्रकाशित किया इसी के कारण भावप्रकाश में सूरदास जी ने अपना जन्म स्थान से ही नामक गांव को बताया और अपने आईने अकबरी में लोगों को यह बताया कि वह अकबर के नौ रत्नों में से एक थे इससे यह सब से प्रखर रूप से संबंधित हुआ केवल लोगों के बीच कृष्ण की लीला को गाने में सक्षम थे

 सूरदास की रचनाएं कौन-कौन सी है

सूरदास जी ने अपनी पूरी जीवन पर्यंत लिखनी प्रकार किया और उनके पांच रूप से प्रमुख ग्रंथ बताए जाते हैं 
1. सूरसागर सबसे प्रमुख और प्रसिद्ध रचना है इसमें सूरदास जी ने तकरीबन सवा लाख से भी ज्यादा पदों को लिखा और संजोया लेकिन अब इस वक्त क्योंकि लिखनी लगभग समाप्त हो चुकी है और वह मिलती नहीं है इसीलिए हमें बहुत ही कठिन था के साथ-साथ से 8000 पद ही मिलते हैं जो कि फिर भी आज के समय में हिंदी साहित्य की सबसे बड़ी रचनाओं में से एक हैं
2.  सुरसारावली में सूरदास सूरदास जी ने कृष्ण की हर एक छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी लीला का वर्णन किया है जिसके कारण वह इस पूरे अध्याय और ब्रजभाषा में सबसे अनोखे साबित होते हैं
3. साहित्य लहरी में सूरदास जी ने अनेक प्रकार के कूट पदों को संकलित किया है जिसमें उन्होंने अलग-अलग तरह की विशेष मरमों और वात्सल्य रस को प्रकट किया है जिसके कारण लोग अपने सामान्य जीवन में किस प्रकार की गलतियां और किस प्रकार के हास्य पद और रचनात्मक कार्य करते हैं इसका वर्णन किया है
4.  नल दमयंती सूरदास जी की रचनाओं में ठीक है जो कि श्रद्धा पूर्वक कथाओं का वर्णन करती है
5. ब्याह लो एक सामाजिक संरचना है और यह लोगों की वैवाहिक एवं सामाजिक स्थिति को दर्शाती है

अपने जीवन काल में सूरदास जी ने अत्यंत रचनाओं को संकलित और लीलाओं का ज्ञान किया है इसी प्रकार से साहित्य लहरी सूर सरावली सूरसागर इन सभी में अलग-अलग प्रकार के पदों के साथ उन्होंने अपनी वात्सल्य रस का भरपूर प्रयोग और प्रमाण दिया है उनकी सबसे बड़ी काव्यगत विशेषता यह थी कि वह भगवान श्री कृष्ण की हर एक रुप और योग रूप से साथ साथ अलग-अलग तरह की विचारों को प्रकट करने में सक्षम हुए

सूरदास जी की मृत्यु
सूरदास जी हमेशा ही एक वीरा और एक तंबूरा ले करके गली-गली लोगों के बीच में जाते थे और कृष्ण लीला का बखान करते थे सूरदास जी की मृत्यु कृष्ण लीला करते हुए 1580 में हो गई इस प्रकार उनकी कुल आयु तकरीबन 102 वर्ष की रही अपने इस लंबे जीवन काल में उन्होंने कई ग्रंथ लिखे और अनेक काव्य रचनाओं का सृजन किया सूरदास जी का संपूर्ण जीवन कृष्ण भक्ति के लिए समर्पित रहा जैसे कि मीराबाई ने अपने पदों के साथ कृष्ण को अमर कर दिया था

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