तीसरा पिल्ला एक कहानी बच्चे की !
मकर संक्रांति! जी हां, मकर संक्रांति ही तो थी उस दिन। ठीक ठीक याद है।
इसके तीन-चार दिन पहले ही तो आये थे तीनों पिल्ले! जिसमें एक तो बढ़ा सयाना था। शेर की तरह निर्भीक और निडर भी। चेहरे के हाव भाव और चाल ढाल से सचमुच वह लीडर था। दूसरा पिल्ला थोडा पहले वाले से थोड़ा कम। लेकिन तीसरा पिल्ला!
हर काम में थोड़ा पीछे रहता, पीने से लेकर खाने तक। छीना- झपटी, चलने -सोने में! थोड़ा सुस्त, थोड़ा कमजोर भी था।
इन सभी लोगों को अभी घर आए हुए तीन चार दिन ही तो बीते थे। पूरी तरह तीनों अभी घर में घुल -मिल भी नहीं पाए थे! इसीलिए इनका नामकरण भी पूरी तरह अभी न हो पाया था। रहने -सोने का इंतजाम भी जैसे- तैसे ही था।
घर में एक कुत्ता जो कई सालों से घर में पहले ही था और रात में फोल्डिंग पलंग पर ही सोता था। ठीक उसी पलंग के नीचे बोरी बिछा कर तीनोंं पिल्लों को दो-तीन दिन से सुलाया जा रहा था।
देखरेख
खाने में टोस- बिस्कुट और पीने के लिए दूध दिया जा रहा था। छोटा बेटा राहुल इन सब की देखरेख में पूरी तल्लीनता के साथ लगा रहता था। अभी कल ही की तो बात है, रात में सोते समय जब बड़ा कुत्ता सो रहा था बगल में,तो तीनों पिल्ले मिलकर उसकी पूछ खींच रहे थे।जिसके कारण वह "भौं! भौं"कर के भौंकने लगता था रात में! जिसके कारण कुत्ते को बरामदे से बाहर पलंग सहित कर दिया था। मगर रात में ठंड लगती देखकर उसे एक पुरानी चादर से ढक दिया था, जिसके के कारण तीनों भाई- बहन आपस में बरामदे में एक दूसरे के गले लिपटकर बड़े ही प्रेम -भाव से रात भर मस्ती से सोए थे आज!
आज सुबह मकर संक्रांति थी। सवेरे चार बजे ही से नींद खुल गई थी मेरी! उठते ही तीनों बच्चे दौड़ कर पांव से आकर लिपट गये थे। कई बार मना करने पर वह अलग हुए थे पांव से। लेकिन दौड़े-दौड़े बाथरूम तक चले ही गए थे, ठंड की परवाह किए बगैर। मेरे मंजन आदि कर लेने के तुरंत बाद वह तीनों फिर मेरे साथ साथ दौड़ते हुए कमरे के बरामदे में आ गए थे उछलते- कूदते हुए।
मैंने भी उन्हें भूखा जानकर सुबह-सुबह तीन- चार टोस खिलाया था ।टोस पाकर तीनों ऐसे झपट पड़े थे कि जैसे कई दिन के वह भूखे हों! बड़े मन से तीनों खा पीकर एक दूसरे से चिपक कर सो गए थे!
ठंड होने के बाद
दूसरी बार फिर मैं जब 5:00 बजे उठा तो देखते ही मेरे पास तीनों फिर दौड़कर आए। बाहर कोहरा और ठंड होने के बाद भी, मना करते रहने पर भी वह मेरे साथ दौड़ कर शौचालय तक गए और साथ-साथ लौटे। थोड़ा बिस्किट आदि खाकर तीनों लिपट कर सो गए। ठंड लगती देखकर मैं अपने ओवरकोट से उन्हें ढक कर फिर लेट गया!
सवेरे जब नींद खुली तो करीब 8:00बजे तीनों पिल्ले आपस में उछल- कूद कर रहे थे। लेकिन थोड़ी देर बाद धर्मपत्नी जी ने बताया कि तीसरा जो सबसे कमजोर पिल्ला था, बाहर न जाने क्यों कार के पास लेट गया है।यह सुनते ही बेटा राहुल और मैं दौड़े- दौड़े बाहर आए, तो देखा प्यारा पिल्ला जमीन में बेसुध पड़ा था! तुरंत उसे बोरी लगाकर उसमें लिटाया और चद्दर से ढक कर कहा कि-" लगता है इसे ठंड लग गई होगी! अभी थोड़ी देर में धूप लगने पर ठीक हो जाएगा।"
मगर आधे घंटे बाद उसे जमीन पर छटपटाते देखकर धर्मपत्नी जी ने आकर बताया-
"लगता है अब यह छोटा पिल्ला नहीं बचेगा!"इतना सुनते ही बेटा राहुल और हम दौड़े-दौड़े कार के पास बाहर आकर देखते हैं, तो पिल्ला के प्राण -पखेरू निकलना ही चाह रहे थे। उसकी गर्दन टेढी हो गई थी। पैर फैला कर वह छटपटा रहा था। उसकी इहलीला समाप्त होने वाली थी।और हम सब असहाय से होकर खडे हाथ मल रहे थे।
कचोट
मन में एक हूक सी उठ रही थी। एक मसोस थी, कचोट- सी उठ रही थी दिल में। कुछ भी न कर पाने, अपने यहां सड़क से घूमते टहलते आये इन बेजुबान तीनों मेहमानों में से एक को देखते -देखते यूं ही चले जाने पर।ईश्वर ने मुझे सब कुछ दिया था, लेकिन आज ऐसा लग रहा था कि जैसे मेरा कुछ खास मुझसे जबरदस्ती कोई मुझसे छीने लिए जा रहा है और मैं हूँ कि कुछ कर नहीं पा रहा हूं-----बेबस!असहाय-सा और कमजोर भी! -----और देखते-देखते उसके प्राण निकल ही गये।
आज मकर संक्रांति है, लेकिन मन में दुखों का गुबार -सा छाया हुआ है। आसमान में छोटी बड़ी टेढ़ी-मेढ़ी, लाल पीली उड़ती हुई पतंगें हैं। छत पर कनकौवे लड़ाते ---"भक् काटा"की टेर लगाते छोटे बड़े लड़के! बड़े बूढ़े! और गोद में छोटे-छोटे बच्चों को लिए आसमान की ओर टकटकी लगा कर देखती,निहारतीं अनगिनत नयी पुरानी बूढी जवान आंखें।
नीचे घर में थाली प्लेट में रखा सजा लाई चिवड़ा!ढुंढे!गट्टा!गजक।लेकिन कुछ भी खाने का मन नहीं कर रहा, क्यों कि आज मेरा प्यारा सा!नन्हा सा 'तीसरा पिल्ला' जो नहीँ रहा।
शैलेन्द्र कुमार मिश्र (लेखक)
प्रधानाचार्य( कार्यवाहक);
सेन्ट थामस इन्टर कालेज,
शाहगंज, जौनपुर, उ0प्र0।
इस कहानी से हम जीवन की मार्मिक व्यथा और अपनों की महत्तव को जानतें है।
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