डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन के बारे
सर्वपल्ली राधाकृष्णन के विचार
शिक्षक किसी परिचय का मोहताज नहीं होता, लेकिन वह दूसरों के परीक्षा को बनाने में सबसे बड़ा सहायक होता है. शिक्षक समाज का रचयिता होता है.
एक व्यवसाई पैसे बनाता है लेकिन एक शिक्षक इंसान बनाता है. मनुष्य को इंसान बनाना या शिक्षा के हाथों में एक मनुष्य को सौंपना यह शिक्षक का कार्य होता है. शिक्षक की सबसे सबसे बड़ा आभूषण उसकी सादगी और लोगों के प्रति सामाजिक उत्तरदायित्व का आकर्षण होता है.
जिस प्रकार से कुम्हार मिट्टी के बर्तनों का निर्माण करता है उसी प्रकार से शिक्षक बच्चों के द्वारा उन्हें शिक्षा पर करके उन्हें एक समाज का निर्माण करता है. जीवन के निर्माण में शिक्षक का सहयोग सबसे अमूल्य है.
डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने हमेशा से शिक्षक धर्म का पालन किया और लोगों को शिक्षा के के लिए जागरूक किया एवं उन्हें प्रोत्साहित किया.
सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जीवन के महत्वपूर्ण सारांश
- अपने पूरे जीवन काल में उन्होंने अपने जीवन के हर पड़ाव में लोगों को यह संदेश दिया कि लोग उच्च पदों पर रहने के बावजूद शैक्षणिक सहयोग दे सकते हैं.
- यदि आप किसी भी चीज को बदलना चाहते हैं तो आप में अथक प्रयास की क्षमता होनी चाहिए.
- यदि आप लोगों में बदलाव चाहते हैं तो आपको स्वयं बदलाव करने की ताकत रखनी चाहिए.
- लोगों का विचार बदलने से पहले स्वयं का विचार बदले.
- लोगों की क्षमता से पहले अपनी क्षमता के ऊपर भरोसा रखें.
- बिना किसी के बहकावे में आए हुए अपने कार्य को लगातार करते रहे.
- कभी भी परिणाम की चिंता नहीं करनी चाहिए और लगातार आगे बढ़ते रहने से ही सफलता हाथ लगती है.
- सफलता के हर आयाम को आजमाना चाहिए पता नहीं कौन सा रास्ता आपके लिए सही है.
- दुनिया में अनेकों रास्ते हैं जिन्हें जो सफलता के मार्ग पर तथा सफलता के मार्ग पर जाते हैं, लेकिन यह आप पर निर्भर करता है कि आप कौन सा रास्ता चुनते हैं.
- यदि आप के मार्ग में कोई पत्थर है इसका मतलब जरूर ही पत्थर के उस पार एक बहुत बड़ा तालाब है.
- लगातार सच्चाई के मार्ग पर चलते रहें बिना किसी की परवाह किए.
- एक अच्छा इंसान वह होता है जो दूसरों की अच्छाई को सामने लेकर आता है.
- लोगों से सिर्फ अच्छाई की उम्मीद न रखें क्योंकि कभी-कभी वह आपकी भावनाओं को समझ नहीं पाते. इसलिए उन्हें माफ़ करके आगे बढ़कर सही करने की कोशिश करें.
- शिक्षा का कार्य से शिक्षा देकर की संपूर्ण नहीं हो जाता उसे अम्लता में ले आना एक शिक्षक का धर्म है.
- शिक्षा पालने से ही कोई व्यक्ति शिक्षक नहीं हो जाता. कई बार लोगों को अपनी पढ़ाई की और जीवन की सच्चाई के बीच में फर्क समझना जरूरी होता है. यह ज्ञान केवल वास्तविकता के साथ ही प्राप्त होगा.
- समय सबसे बड़ा शिक्षक है उसके साथ हमेशा अपना तालमेल बनाए रखें.
- बच्चों का मन कोमल होता है उसे कभी भी दुखाना नहीं चाहिए बल्कि एक कुमार की तरफ से बनाना चाहिए.
कौन थे डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन?
5 सितंबर को पूरे भारतवर्ष में यह सबसे बड़ा सवाल होता है कि आखिर डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन कौन थे?
यदि आपके अपनी शिक्षा पूरी की है तो आप यह जरुर जानते होंगे कि डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन और 5 सितंबर में क्या संबंध है. क्योंकि जब आप शिक्षक दिवस मनाने जाते हैं तो हमेशा मुस्कुराते हुए, आप को संदेश देते हैं कि शिक्षा ही सबसे बड़ा धन है.
दोस्तों डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म 5 सितंबर 1888 को चेन्नई से लगभग उत्तर पश्चिम की तरफ 200 किलोमीटर दूर एक बहुत ही छोटे से कस्बे तिरुताणी में हुआ था. तिरुताणी एक ऐसा इलाका है जहां पर लोगों के लिए मूलभूत सुविधाएं काफी कम है. हालांकि यह बात आज से 100 साल पहले की है और तब की बात है जब देश अंग्रेजों की गुलामी करता था. डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जन्म स्थान होने के कारण अब चेन्नई का वह स्थान काफी समृद्ध है.
डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन और शिक्षक दिवस में क्या संबंध है?
डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने अपना अधिकतर समय शिक्षण कार्य में ही व्यतीत किया. उन्होंने हमेशा अपने जन्मदिवस पर बच्चों के साथ एवं शिक्षकों के साथ रहना पसंद किया.
यही कारण था कि बच्चे और यहां तक कि शिक्षक इनके साथ रहा करते थे, उन्होंने उनके जन्म दिवस को शिक्षक दिवस के रूप में मनाना शुरू किया.
आपकी जानकारी के लिए हम यह बता दें कि उन्होंने देश के कई विश्व विद्यालय में शिक्षण कार्य किया किंतु 1939 से लेकर के 1948 तक देश के सबसे समृद्ध हिंदू विश्वविद्यालय, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में कुलपति के रूप में कार्य किया.
अपने शिक्षण कार्य में उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय यानी BHU के पूरे प्रांगण को कई दिशाओं में विकसित किया जिसके कारण हम आज हुई बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की खातिर विश्व स्तर पर जानते हैं.
उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति रहते हुए अपना सर्वस्व जोग दिया. उन्होंने विश्वविद्यालय के विकास के लिए हर प्रकार के शिक्षकों की नियुक्ति करवाई और हर प्रकार के शिक्षण कार्य को शुरू किया. जिसके कारण आज बनारस हिंदू विश्वविद्यालय सभी प्रकार के शिक्षण कार्यों में लिप्त है और सबसे उच्च शिक्षा प्राप्त कर आ रहा है.
शिक्षक गुणवत्ता पर काम करना:
अपने शिक्षण कार्य में डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने शिक्षा की गुणवत्ता के ऊपर सबसे ज्यादा काम करने की कोशिश की. उन्होंने बच्चों को शिक्षा देने के बजाय उचित शिक्षा देने की ओर ज्यादा ध्यान दिया.
जिसके कारण बच्चे मूल्यवान शिक्षा को धारण करते थे और समाज कल्याण के लिए कई बड़े पदों पर आसीन हुए. इसी प्रकार से डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने राजनीतिक सफर का शुरुआत किया. जिसके बाद से उन्होंने समाज कल्याण की ओर काम करते वक्त, देश के राष्ट्रपति पद को संभाला.
राधाकृष्णन के माता-पिता का नाम
डॉक्टर साहब का जन्म एक बहुत ही साधारण परिवार में हुआ था. इनके पिता जमींदार के यहां साधारण नौकरी किया करते थे. जिससे इनके परिवार की गुजर-बसर हुआ करती थी.
डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के पिता का नाम सर्वपल्ली वी रामास्वामी और माता जी का नाम श्रीमती सीता झा था. रामास्वामी जी एक अत्यंत गरीब ब्राह्मण थे लेकिन उन्होंने कभी भी अपने सम्मान के साथ समझौता नहीं किया.
एक समय की बात है कि जब रामास्वामी जो कि डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन के पिता थे उन्होंने अंग्रेजों के दिए हुए पैसों पर किसी भी प्रकार के गृह निर्माण कार्य को करना उचित नहीं समझा. वह मानते थे कि अंग्रेजों के दिए हुए पैसे सरकार के पैसों की बेगारी है. उनका यह भी मानना था कि उस वक्त अंग्रेजों के लिए पैसे लोगों पर किए गए और उन पर लगाए गए लगान का परिणाम है.
यही कारण था कि उनकी माता श्रीमती हमेशा अपने खेतों के खानों का ही भोजन कराती थी और कभी भी किसी प्रकार की बाहरी चीजों को नहीं देती थी. उनका मानना था कि हम स्वदेशी अपनाएंगे तभी हम स्वदेश की तरफ आगे बढ़ पाएंगे. यही परिणाम था जिसके कारण 1947 में भारत आजाद हुआ और पूरे विश्व में भारत ने दिखलाइए.
अपने बचपन के दिए हुए संस्कार को डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कभी भी नजरअंदाज नहीं किया और हमेशा उन पर अमल किया.
डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने अपनी ऑटोबायोग्राफी में यह लिखा है कि एक समय ऐसा आया था जबकि व राष्ट्रपति पद पर रहते हुए उन्हें कई प्रकार के प्रलोभन को दिया गया.
किंतु उन्होंने अपनी माता-पिता के दिए हुए वचनों और उनके शिक्षा को याद किया. उन्होंने यह भी याद किया कि उन्होंने हमेशा अपने शिक्षण कार्य में बच्चों को क्या सिखाया. जिसके कारण उन्होंने भारत का एक बहुत बड़ा नुकसान होने से बचाया.
भाई और बहन
डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के चार भाई थे एवं उनकी छोटी बहने थी. डॉक्टर सर्वपल्ली अपने छह भाई-बहनों में सबसे छोटे थे. इस प्रकार से उनके पूरे परिवार में उनके माता-पिता और उनके भाई बहनों को मिलाकर के कुल संख्या होती थी. जिसके कारण उन्हें खाने-पीने की अत्यंत कम थी.
किंतु इसके बाद भी डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने इन सभी जरूरतों को पूरा करते हुए अपने आप को ऐसे देख लिया कि प्रतिभा किसी भी प्रकार की मोहताज नहीं होती.
डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन की दिनचर्या:
डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के आत्मकथा के अनुसार उन्होंने बताया कि जब उनका पूरा परिवार आर्थिक तंगी से गुजर रहा था. उस वक्त सुबह लोगों के यहां पेपर देना और शाम को लोगों के घर के काम करना. यह दोनों ही प्रकार के कार्य को किया. जिससे कि उनके परिवार की आजीविका पर किसी भी प्रकार की कोई आंच ना आए.
इसके साथ ही साथ डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन अपनी पढ़ाई को भी पूरी तवज्जो दिया करते थे. अपनी पढ़ाई की प्राथमिकता के साथ साथ वह लोगों को शिक्षित करने का काम भी शुरू कर दिया था. धीरे-धीरे उन्हें शिक्षण कार्य में रुचि आने लगी. उन्हें किताबें पढ़ना तथा लोगों को शिक्षा देना पसंद आता था.
अपनी इसी रुचि के कारण उन्होंने शिक्षक बनने का निर्णय लिया जिसके बाद उन्होंने अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद विश्वविद्यालय में प्रोफेसर की उपलब्धि हासिल की. यही वह मुख्य कारण था जिसके कारण से आज भी हम डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन को टीचर्स डे पर याद करते हैं और उनकी जन्म दिवस को टीचर्स डे के रूप में मनाया जाता है.
अपने शिक्षण शैली में डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने अनेकों बदलाव किए. उन्होंने काशी विश्व हिंदू विश्वविद्यालय में कुलपति रहते हुए सभी प्रकार के शिक्षाओं को बल दिया. उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय में हर तरह की शिक्षा पर बल दिया और हर प्रकार के शिक्षकों को विश्वविद्यालय तक लेकर के आए.
उनकी अपने ही एक वक्तव्य के अनुसार, जब अलग-अलग विधाओं को विश्वविद्यालय में लाने की चेष्टा कर रहे थे. उस वक्त उनके अपने ही विश्वविद्यालय के बहुत सारे प्रोफेसर हैं या नहीं चाहते थे कि अन्य प्रकार के शिक्षण कार्य शुरू हो. उनमें से उनका एक मुख्य मकसद दिया था कि यहां पर विश्वविद्यालय में अलग अलग रख विद्या सिखाने की काबिलियत नहीं है.
दूसरा मुद्दा यह था कि लोग चाहते थे कि केवल वही के लोग शिक्षण कार्य में रहे किसी और जगह के ना रहे. उस वक्त सती प्रथा का विचलन था जिसका डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने स्वामी विवेकानंद के अनुसार विरोध किया. इन दो प्रमुख कारणों के कारण डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के कार्यकाल में अनेकों प्रकार की व्यवधान आया.
राजनीति के सफर की शुरुआत:
स्वामी विवेकानंद की राह पर चलते हुए उन्होंने सती प्रथा को संपूर्णता बंद करवाया और साथ ही साथ वह बाल विवाह के प्रति भी लोगों को जागरूक करना चाहते थे. अपनी इसी रूचि के कारण व राजनीति के संदर्भ में राष्ट्रीय जनता कांग्रेस पार्टी से जुड़े.
इसी सफर के दौरान उन्हें महात्मा गांधी के साथ मिलने का अवसर प्राप्त हुआ. अपने सफर के दौरान उन्होंने महात्मा गांधी के कई सारे रहस्यों को समझाया और उनकी सभा में आने वाले लोगों की मदद की.
यह देखने के बाद महात्मा गांधी ने उन्हें अपने मुख्य सलाहकार के रूप में नियुक्त किया. जिस प्रकार से हम सभी जानते हैं कि डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन देश के दूसरे राष्ट्रपति थे. उसका एक मुख्य कारण महात्मा गांधी का सलाहकार होना भी था.
वह हमेशा से ही राष्ट्रीय जनता कांग्रेस पार्टी के मुख्य सलाहकार के रूप में कार्य करते रहे और उन्हें प्रथम उपराष्ट्रपति के रूप में नियुक्त किया गया.
राजनीतिक कार्यकाल में व्यवधान:
डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के द्वितीय राष्ट्रपति बनने के बाद ही चीन ने भारत के ऊपर 1962 में हमला कर दिया जिसमें कि चीन ने विजय हासिल की और भारत ने अपने अनेकों सैनिकों को कब आया.
इसी कार्यकाल के दौरान दो प्रधानमंत्रियों की आकस्मिक मौत हो गई जिसके कारण डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन को अनेक व्यवधान ओं का सामना करना पड़ा.
अपने कार्य से विमुख नहीं होते हुए उन्होंने इस सभी कार्यों को बहुत ही सफलतापूर्वक किया किंतु उनकी पूरे कैरियर पर दो प्रधानमंत्रियों को नियुक्त करने की जिम्मेदारी भी छोड़ कर गए.
अपने सफर के दौरान उन्होंने राजनीतिक कार्यकाल में अनेक उतार-चढ़ाव देखे किंतु वह किसी भी प्रकार के प्रलोभन एवं लालच से विमुख नहीं हुए.
उनकी अपनी आत्मकथा के अनुसार जब वह राष्ट्रपति के कार्यकाल पर थे तो एक सांसद द्वारा उन्हें प्रलोभन दिए जाने पर उन्होंने उसको साफ मना कर दिया. और उसके खिलाफ कार्यवाही करते हुए उन्होंने उसकी सांसद निधि को पूरी तरीके से बंद कर दिया था. हालांकि यह मुद्दा उस वक्त के जन जागरण अखबार में बहुत ही प्रमुखता से छापा गया किंतु इसका किसी भी प्रकार से प्रभाव नहीं हो पाया.
बाद में, डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन की मृत्यु के बाद जब उनके पुत्र ने, डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के ऊपर किताब लिखी तो उन्होंने इस बात को प्रकाशित किया कि डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन सांसद के प्रति उठाए गए मुद्दे को लेकर के बहुत ही विचलित थे.
अपनी इसी कार्यकाल के दौरान डॉ राधाकृष्णन ने अनेक विश्वविद्यालयों की शुरुआत की. डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के नाम से आज तीन प्रमुख विश्वविद्यालय संचालित हो रहे हैं जिनका नाम इस प्रकार है:
- सर्वपल्ली राधाकृष्णन यूनिवर्सिटी भोपाल
- डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन राजस्थान आयुर्वेद यूनिवर्सिटी,
- डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन राजस्थान आयुर्वेद विश्वविद्यालय जोधपुर
ये तीनों ही विश्वविद्यालय भारत के विश्वविद्यालय में मान्यता प्राप्त एवं वित्त संचालित विश्वविद्यालय हैं जिन्हें केंद्र सरकार संचालित करती है.
इन सभी शिक्षण संस्थानों में आयुर्वेद के शिक्षा प्रदान की जाती है इसके साथ ही साथ बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में कुलपति के रूप में विद्यमान रहे डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन का, पुस्तकालय में एक अलग स्थान भी प्रदान किया गया है.
डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन का व्यक्तित्व:
आज भी जब भी हम कभी टीचर्स डे पर डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन की मूर्ति का अनावरण या माल्यार्पण करते हैं तो हमेशा उनकी मुस्कुराती हुई तस्वीरों को बच्चों के सामने प्रस्तुत करते हैं.
इस बात का जिक्र करते हुए उनके बेटे ने जब उनकी बायोग्राफी को छापा, उन्होंने इस बात का जिक्र किया कि मेरे पिता हमेशा अनेक संकटों के साथ गुजरते थे. किंतु कभी विचलित नहीं होते थे क्योंकि वह हमेशा लोगों को शिक्षा देने जागरूक रहते थे.
राधा कृष्ण की बायोग्राफी के अनुसार उनके द्वारा की गई शिक्षण संस्थानों में बदलाव की प्रक्रिया और उसका अनावरण, शिक्षा पद्धति को एक नए स्तर पर ले कर गई है. उन्होंने इस बात को बहुत ही प्रमुखता से छापा है कि पहले किसी भी प्रकार के विषय सूची की प्रमुखता पाठ्यक्रम में नहीं दी जाती थी.
पहले के समय में लोग केवल आश्रम विद्या पर ही ज्यादा निर्भर क्या करते थे. किंतु उन्होंने विषय सूची और विषय प्रणाली को जोरदार बल दिया. जिसके कारण लोग एक प्रमुख विषय के प्रति एक प्रमुख अनुच्छेद के ऊपर काम किया करते हैं. इससे शिक्षकों एवं विद्यार्थियों दोनों को एक समय पर एक ही प्रकार की प्रदर्शन करने पर बल दिया जाता है.
यह उनकी रूचि एवं उनकी क्षमता पर भी निर्भर करने की छूट देता है. उदाहरण के तौर पर यदि किसी विद्यार्थी को विज्ञान में रुचि है तो वह केवल विज्ञान के पाठ्यक्रम पर ही अपना ध्यान दे सकता है. अन्यथा पहले लोगों को सभी प्रकार के विषय शब्दों को पढ़ने की जरूरत होती थी.
एक विद्यार्थी के जीवन में सभी चीजों की आवश्यकता ना होने पर भी सारी ज्ञान को हासिल करना आवश्यकता. डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने इस प्रकार की विषय सूचियों को तैयार किया जिससे कि कम समय में ज्यादा से ज्यादा, आवश्यक ज्ञान को लोगों तक पहुंचाया जा सके.
कहानी का माध्यम:
डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने काशी विश्व हिंदू विश्वविद्यालय में कुलपति रहते हुए पाठ्यक्रम में सबसे बड़ा बदलाव करते हुए लोगों में उदाहरण के माध्यम से विद्या को प्रदान करना. तथा लोगों को प्रायोगिक यानी के प्रैक्टिकल कामों में करते हुए उस पर रुचि रखना ज्यादा बल दिया.
अपनी इसी शिक्षण शैली के माध्यम से डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने, कम समय में अधिक पाठ्यक्रम को लोगों तक पहुंचाने का सफल प्रयास किया.
अपने इस प्रयास में शुरू में डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन को अनेक प्रोफेसर और विभिन्न विभाग के विश्वविद्यालय लोगों से अवरोध का सामना करना पड़ा. किंतु बाद में विद्यार्थियों की रुचि और विद्यार्थियों की सफलता देखते हुए वह इस कार्य को सफलतापूर्वक अंजाम देने में सक्षम रहें.
इसका परिणाम यह रहा कि आज भी इसी प्रकार की प्रणाली हम पूरे विश्वविद्यालय और भारत में चल रहे प्रशिक्षण संस्थान के पाठ्यक्रम को देख रहे हैं.
सर्वपल्ली राधाकृष्णन का वैवाहिक जीवन
डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन चेन्नई के ब्राह्मण परिवार से थे किंतु फिर भी उन्होंने पढ़ने के लिए क्वेश्चन के मिशन भी संस्था को चुना. इसका मुख्य कारण उनके परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होना एवं क्रिश्चियन मिशनरी कॉलेज के संस्थापक द्वारा उनका दाखिला कराना था.
सीमित संसाधनों के साथ उच्च गुणवत्ता हासिल करते हुए उन्होंने इसके बाद वैल्यू और मद्रास के कॉलेजों में शिक्षा प्राप्त की शुरुआत से ही मेधावी छात्र थे और शिक्षकों के बीच काफी लोकप्रिय थे. उनकी बायोग्राफी के अनुसार बच्चों के साथ कम शिक्षकों के साथ ज्यादा देखे जाते थे.
इसका मुख्य कारण उनका किताबों के प्रति लगाव और शिक्षकों के साथ मित्रता थी. कला संकाय में स्नातक की परीक्षा में प्रथम आए तो उनके शिक्षकों ने उन्हें स्कॉलर ऑफ द ईयर अवार्ड से सम्मानित किया. जिसका संस्करण हमें उनकी आत्मकथा में मिलता है.
इसके बाद जब उन्होंने दर्शन शास्त्र में स्नातकोत्तर किया और वह मद्रास के रेजिडेंसी कॉलेज में दर्शनशास्त्र के प्रधानाध्यापक के रूप में नियुक्त हुए तब उस वक्त उन्होंने अपने शिक्षण कार्य का लोहा मनवा लिया था. हालांकि एक बहुत ही साधारण प्रधानाध्यापक के रूप में, उन्होंने कम समय में पूरे प्रांगण में उचित सम्मान को हासिल किया था जिसका जिक्र भी उनके पुत्र ने उनकी आत्मकथा में किया है.
डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म 5 सितंबर 1888 में हुआ और उस समय उनके दांपत्य जीवन की शुरुआत बहुत ही कम समय में हो गई. अंग्रेजों के शासन में, किसी भी सामान्य व्यक्ति का दांपत्य जीवन बहुत ही जल्दी शुरू हो जाता था किंतु डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन अपनी समाज एवं पढ़ाई के कारण वह जानते थे कि बाल विवाह करना उचित नहीं है.
किंतु उम्र में कम होने के कारण और ज्यादा समझना होने के कारण उनका विवाह मात्र 16 वर्ष की आयु में 1903 में उनकी दूर की रिश्ते की बहन शिवा कामों के साथ हो गया. उस वक्त उनकी पत्नी की उम्र मात्र 10 साल थी.
डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन की इंडियन फिलासफी
राधाकृष्णन आयोग आज भी डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन की इंडियन फिलासफी के कारण जाना जाता है. डॉक्टर सर्वपल्ली का भारतीय दर्शनशास्त्र साहित्य एवं शिक्षण के दिशा में उनका योगदान अद्भुत था.
उनकी शिक्षा लेखन और राजनीति में दूरदर्शिता के कारण ही उन्हें भारत के प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने महान दार्शनिक के रूप में एवं शिक्षाविद के रूप में उन्हें लेखन के साथ-साथ साहित्य के रुझान के प्रति देश का सर्वोच्च पुरस्कार भारत रत्न प्रदान किया था.
डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन माहिती के कारण ही उन्होंने, लोगों की सोच के बारे में प्रदर्शित किया. इसके साथ ही साथ साथ उन्होंने अपने शैक्षणिक जीवन काल के अनुभव को भी साझा किया. उन्होंने शिक्षा लेखन के प्रति उल्लेखनीय कार्य किया.
जिसके सर्वोपरि उन्हें देश का सबसे बड़ा भारत रत्न पुरस्कार तो मिला ही. उनके मरने के बाद मार्च 1975 में संयुक्त राष्ट्र अमेरिका की सरकार ने उन्हें टेम्पलटन पुरस्कार को प्रदान किया.
यह किसी भी भारतीय को मिला सर्व प्रथम पुरस्कार है. यह पुरस्कार लोगों को धर्म के क्षेत्र में उत्थान के लिए दिया जाता है. और यह भी ऐतिहासिक है कि सर पल्ली राधाकृष्णन को यह पुरस्कार एक ब्राह्मण होने के तथा हिंदू होने के साथ ही मिला. जबकि आज तक के इतिहास में अमेरिका में यह पुरस्कार केवल क्रिश्चियन धर्म के लोगों को ही प्राप्त है.
अपनी ऐतिहासिक सोच, और विस्तार वादी एवं शैक्षणिक नीति से डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने भारत के सर्वोच्च कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया. उन्होंने हर दिशा में लोगों का संबोधन किया. एक अच्छे नेता और एक अच्छे व्यक्तित्व के साथ उन्होंने लोगों को समाज के कल्याण के लिए प्रोत्साहित किया.
बच्चे आज भी उनकी अनमोल विचार से काफी कुछ सीखते हैं. इंटरनेट पर सबसे ज्यादा सर्च किए जाने वाले कोटेशंस में, डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के शिक्षा दर्शन के विचार एवं उनकी पुस्तकें बाजार में उपलब्ध है.
डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन की मृत्यु:
सर्वपल्ली राधाकृष्णन का निधन, 17 अप्रैल 1975 को हुआ. इसका कारण उनकी लंबी बीमारी थी. सभी डॉक्टरों के अथक प्रयास के बावजूद वह 2 साल से ज्यादा अपने आपको सांसारिक मोह त्यागने से रोक नहीं सके. अपनी इस बीमारी में उन्होंने अपनी पूरी काया खुद ही थी. उनके रक्त का संचार का काफी क्षीण हो चुका था. उन्हें बोलने तथा सांस लेने में तकलीफ हो रही थी.
अपने शिक्षा के इस प्रकार के अनमोल विचार डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के आज भी लोगों के प्रति सराहनीय है.





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