शिवजी की आराधना और मनुष्य
एक समय की बात है कि कुछ व्यक्ति आपस में घूमते हुए जंगल में एक दूसरे के बारे में बातें कर रहे थे. जंगल में चलते चलते उन्हें एक बड़ा सा वृक्ष दिखाई दिया.
वह काफी थक चुके थे और धूप भी काफी थी इसीलिए उन्होंने उस बड़े वृक्ष के नीचे उस छांव में आराम करने का सोचा. उन्हीं में से एक दोस्त ने कहा देखो दोस्त यह वृक्ष कितना बड़ा और कितना घना है. अगर हमारे पूर्वजों ने इस प्रकार के वृक्षों का वृक्षारोपण नहीं किया होता, तो क्या आज हम इस घनी धूप में आराम कर पाते?
दोस्त का सवाल और काशी का उत्तर
- दोस्त के सवाल पूछने पर उसके सबसे प्रिय दोस्त, काशी ने तपाक से उत्तर दिया. मेरे प्रिय दोस्त यह सब तो भगवान शिव की आराधना का फल है. वरना यदि अगर वह ना चाहे तो इस पूरे विश्व में एक पत्ता भी नहीं हिल सकता.
ऐसा सुनते ही उसके दोस्त का अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा भाव डगमगा गया. और वह पूरे जोश में एवं क्रोध में उसके ऊपर भड़कते हुए बोला. तुम्हारे कहने का मतलब है कि खुद शिवजी और करके इस वृक्ष का वृक्षारोपण कर गए थे?
यदि ऐसा है तो उनसे बोलो कि इसी समय हमें ढेर सारे फलों की व्यवस्था भी करें ताकि हमारा पेट भर सके. साथ ही साथ उनसे यह भी कहो कि वह हमारे लिए पानी की व्यवस्था एवं सोने के लिए उचित पालना लगाएं.
तुम्हारा शिवजी के ऊपर विश्वास तो अच्छी बात है लेकिन यह अंधविश्वास भी ठीक नहीं.
काशी का शांत भरा उत्तर
काशी ने कहा तुम सत्य कह रहे हो या पेड़ स्वयं शिव जी नहीं लगा कर गए हैं लेकिन यह उनकी ही माया है. क्योंकि अगर तुम गौर करो तो इस हरे-भरे जंगल में सिर्फ यही एक ऐसा वृक्ष है जो कि सबसे ऊंचा है और हमें इस वृक्ष की छाया में आराम करने का अवसर मिला है.
यह सिर्फ एक इत्तेफाक नहीं हो सकता यह जरूर शिवजी की अपेक्षा है कि हम उनकी दिए हुए जीवन को किस प्रकार से हरा भरा कर सके?
अगर इस वृक्ष द्वारा हम यह सीखने में सफल रहे, कि अपने जीवन को सदा महान बनाते रहना मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म एवं उसकी प्रकृति है. इसके कारण मनुष्य और प्रकृति दोनों ही मिलकर कि समय आने पर किसी भी व्यक्ति पर आप का साथ देते हैं जिस प्रकार यह पेड़ हमारे लिए इस वक्त घनी धूप में सहायक है.
इस प्रकार की बातें सुनकर उसका दोस्त सोहन को शांत हुआ. किंतु उसने अपनी बात को तर्क देना फिर भी जारी रखा.
उसने कहा यदि तुम कहते हो कि यह सारी कुछ शिवजी की इच्छा है तो उनसे कहो जो मैंने मांगा है वह तुरंत प्रदान करें. अन्यथा मैं यह मान लूंगा कि तुम्हारी सारी बातें बकवास है.
काशी का तार्किक जवाब
काशी ने मुस्कुराते हुए उससे कहा बिल्कुल शिवजी तुम्हारे लिए यहां खाना भी लेकर आएंगे और पानी भी ले ली उससे पहले तुम्हें एक काम करना होगा.
मेरे पास मेरी थैली में सत्तू का आटा रखा हुआ है, क्या तुम कृपा करके इसे पानी के साथ मिलाकर खाने होगी बना दोगे?
इस पर उसका दोस्त मुस्कुराते हुए पूछता है इसका शिवजी और मेरे सवालों से क्या संबंध है? इस पर काशी ने कहा पहले तुम इतना काम तो करो फिर उसके बाद में तुम्हारी इच्छा जरूर पूरी करवा लूंगा.
ऐसा कहने पर उसका दोस्त सोहन सोचता है कि यदि उसकी इच्छा सचमुच में पूर्ण हुई तो से अच्छे अच्छे भोजन खाने को मिलेंगे. सोने के लिए अच्छी व्यवस्था क्योंकि इस वक्त तो काफी थक चुका है.
इतना सोचते सोचते उसने सत्तू के आटे का प्रसाद बनाकर रख लिया. इसके बाद उसने जैसे ही वह प्रसाद सोहन के सामने रखा तो सोहन ने कहा क्या यह तुमने बनाया है?
सोहन का गुस्सा
सोहन इस सवाल से अत्यंत बुरा मान गया. उसने कहा तुमने ही तो मुझे सत्तू के आटे का प्रसाद बनाने के लिए कहा था और मैंने तुम्हारी कहे अनुसार बनाया अभी. अब क्या मुझे यह साबित करना होगा कि यह आटा किसी और ने बनाया है मैंने नहीं?
जबकि तुम मेरे सामने ही हो और तुम सब कुछ जानती भी हो मन ही मन. क्या तुम्हारे मन की श्रद्धा इतनी कम हो गई है या तुम्हारी समझ बिल्कुल गुप्त हो गई है?
काशी का सोहन की प्रकृति के प्रति जवाब
जैसे ही सोहन ने इन बातों को पूछा और कहा, काशी ने दोबारा एक सवाल पूछा अच्छा चलो मान लिया तुमने सत्तू के आटे का प्रसाद बनाया. पर मैं कैसे मान लूं किया मेरे पेट में चला जाएगा?
इस पर सोहन फिर गुस्सा आ जाता है और कहता है यह कैसा बेहूदा सवाल है?
मैंने तुम्हारे लिए सत्तू का प्रसाद बनाया अब तुमको खाना तो स्वयं ही पड़ेगा. इसके लिए थोड़ी मेहनत तुमको करनी ही पड़ेगी.
शिव जी के प्रसंग में काशी का सोहन के प्रति जवाब
इतना कहते ही काशी मुस्कुराते हुए उससे कहा. मेरे दोस्त जैसे बिना मेहनत किए हम अपना भोजन स्वयं नहीं ग्रहण कर सकते. उसी प्रकार से ईश्वर यानी शिवजी ने इस पूरे प्रकृति का निर्माण किया है.
अगर हम यह अपेक्षा करते हैं कि ईश्वर स्वयं आकर के हमारे मुंह में निवाला दे देंगे. या फिर अगर हम ऐसी अपेक्षा करते हैं कि वह हमारे लिए सारे संसाधन उपलब्ध होने के बाद भी हमें वह सब कुछ हमारे सामने प्रकट कर देंगे.
तो यह हमारी मूर्खता ही है कि हम शिव जी के प्रकृति के साथ जुड़े हुए संबंध को नहीं समझ पाए. मेरे दोस्त यह पूरी प्रकृति शिव जी के द्वारा ही रची हुई है. जैसे तुमने सत्तू के आटे के प्रसाद की रचना की.
वैसे ही शिव जी ने उस पूरे विश्व में ब्रह्मांड को रचा है और रचयिता स्वयं हर चीज के लिए आपके पास नहीं आ सकता.
हमें अपने जीवन की सफलता की प्राप्ति के लिए स्वयं ही प्रयास करना होगा. इसका मुख्य कारण यह है कि सफलता हर एक मनुष्य के लिए अलग-अलग परिणाम के साथ आती है.
यदि भगवान शिव स्वयं हर एक सफलता एवं परिणाम के लिए आपके सामने साक्षात दर्शन देने लगे तो उनके दर्शन देने का एवं होने का अर्थ एक साधारण मनुष्य के जैसे हो जाएगा.
यदि तुम हर एक मनुष्य में शिव जी का रूप देखोगे, एवं हर एक वस्तु में शिवजी का अलंकार प्रदर्शित करोगे. तब तुम्हें किसी भी अन्य प्रकार की सहायता की जरूरत नहीं पड़ेगी.
शिव सर्वत हैं कण-कण निवास करते हैं. जिस प्रकार से कहा गया है:
कदम तो रखो काशी में, तर जाओगे काशी में, जन्म तो रखो पृथ्वी पर, तर जाओगे पृथ्वी पर.
यदि मनुष्य की प्रकृति स्वयं भगवान को समझने लगे तो मनुष्य स्वयं भगवान हो जाएगा. इसीलिए मनुष्य की प्रकृति यह है कि वह लगातार काम करता रहे और अपना पग आगे बढ़ाता रहे. इस मनुष्य समाज कल्याण के लिए मनुष्य जितने कार्य कर सकता है उसे करनी चाहिए.
शंका, घर की लंका
आखरी में काशी ने बताया कि जैसे तुम शिवजी और वृक्ष के साथ संबंध नहीं जोड़ पा रहे हो. अर्थात तुम्हारे मन में शंशा है.
और यह याद रखो कि जिसके मन में शंका होती है उसी के घर में लंका लगती है. किस प्रकार से रावण ने, अपने मन में शंका रखते हुए सीता जी का हरण किया था. उसके बाद हनुमान जी ने उनकी पूरी लंका तहस-नहस कर दी.
इसी प्रकार मनुष्य के मन की लंका में यदि किसी भी प्रकार की शंका आती है. तुम मनुष्य का सर्वनाश होना तय है.
क्योंकि यदि आप किसी भी प्रकार की शंका में है तो आप उस कार्य को सही तरीके से नहीं कर सकते. इसीलिए हमेशा शिवजी पर विश्वास रखिए और आगे बड़े.
महाशिवरात्रि के अवसर पर आप सभी को शिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं!
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