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मिलने को आज शाम को - वनिता गोलेच्छा की कविता

 मिलने को आज शाम को

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जब से तुमने कहा है
मिलने को आज शाम को

तब से मन नहीं रहा
करने का किसी काम को

न जाने क्यों
बार-बार देखती हूं घड़ी
चंद घंटों की दूरी भी
लग रही है बड़ी
नजर लग गई है जैसे
मेरे चैन और आराम को
मन नहीं कर रहा
करने का किसी काम को

ये पहनूं वो पहनूं
ना समझ आए क्या पहन के जाना
क्योंकि आज लक्ष्य है
सीधा तुम्हारे दिल में उतर जाना

यह तो मैं पा ही लूंगी

चाहे जो भी अंजाम हो
मन नहीं कर रहा

करने का किसी काम को 

दिल में सब जमा कर ली है
जो करनी है तुमसे बात
मेरी बातें ख़तम न होंगी
आप जाएगी सारी रात

इसलिए अपने सुबह शाम

लिख दो मेरे नाम को
मन नहीं कर रहा
करने का किसी काम को...

वनिता गोलेच्छा

भावार्थ:

कवित्री है कहना चाहती है कि जब से तुम ने कहा है कि तुम आज शाम को मुझसे मिलने आओगे.

तब से मेरा मन बेचैन हो रहा है मेरा तन बदन सब कुछ किसी भी काम में नहीं लग रहा.

मैं हर वक्त घड़ी को बार-बार देखती रहती हूं.  हालांकि यह सिर्फ कुछ घंटों की ही बात है कि कुछ देर में शाम हो जाएगी और हम तो मिल जाएंगे.

लेकिन अब यह चंद घंटे भी मेरे लिए बहुत बड़े लग रहे हैं.  ऐसा लग रहा है कि मेरे चैन मेरे सुकून मेरे इत्मीनान को किसी की नजर लग गई है.

तुमसे मिलने के लिए क्या पहनो यह समझ में नहीं आ रहा.  मैं चाहती हूं कि जब तुम मुझे देखो तो मैं सीधे तुम्हारे दिल में जगह बना लूं.

कवित्री आगे अपनी कविता में कहती है कि उसने अपने दिल में सारी बातों का खाका तैयार कर लिया है कि जब वह अपने प्रेमी से मिलेगी तो वह क्या-क्या बातें करेंगे.

वह इतनी बातें करेंगे कि सारी रात खत्म हो जाएगी लेकिन बातें खत्म नहीं होगी.

कवित्री इस कविता में अपने प्रेमी से मिलने वाली आकांक्षा को एक बड़े पैमाने पर सचिव की कविता के रूप में पिरोया है  जो सराहनीय है.

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