महाभारत के युद्ध में, कैसे बनता था लाखों सैनिकों का भोजन?
महाभारत के अनुसार, युद्ध में लाखों सैनिकों को भोजन की व्यवस्था कराना। एक अत्यंत कठिन चुनौतीपूर्ण कार्य था। क्योंकि उस वक्त तकरीबन पचास लाख से ज्यादा सैनिक रोज आपस में लड़ते थे।उसमें से कई हजार रोज मारे जाते थे, ऐसे में इतनी बड़ी संख्या और उसका भोजन व्यवस्थित कराना। यह एक अत्यंत ही विकट कार्य था। इसीलिए आइए समझते हैं कि कैसे श्री कृष्ण और महाभारत की सेना ने किस प्रकार कुल 18 दिन अपने भोजन की व्यवस्था खाने-पीने के साथ की?
श्री कृष्ण, एक ऐसा नाम जिसे परमेश्वर के रूप में पूजा जाता है। ऐसा सिर्फ इसलिए क्योंकि एक साधारण से दिखने वाले, जय श्री कृष्ण ने परमात्मा होते हुए भी मनुष्य रूप धारण किया। श्री कृष्ण भगवान महाभारत का एक अभिन्न अंग बन कर के इस अवतार में सामने आए।
महाभारत युद्ध की परिकल्पना
महाभारत के अनुसार, महाभारत की युद्ध की परिकल्पना, तभी हो गई थी, जब दुर्योधन ने श्रीकृष्ण के समझाने पर भी पांडवों को 1 तिनका भी जमीन ना देने की बात कही। उसी वक्त भगवान श्री कृष्ण ने महाभारत की रचना की।
श्री कृष्ण जी, जब दुर्योधन को भरी सभा में, सभी सम्मानित मंत्रियों और द्रोणाचार्य तथा भीष्म पितामह के सामने, जहां पर विदुर और कर्ण भी बैठे थे। और साथ ही साथ इस पूरे महाभारत के कुटिल चरित्र में शकुनी एवं अन्य लोग बैठे थे। तब उस वक्त श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा कि मैं स्वयं के तरफ से आया हूं और आप सब से विनती करता हूं कि आप होने वाले इस महायुद्ध को रोकने और इससे होने वाले विनाश को टाला जा सकता है। अगर आप पांडवों को सिर्फ केवल 5 गांव प्रदान कर दें बाकी। अगर आप चाहे तो पूरा का पूरा साम्राज्य और हस्तिनापुर रख सकते हैं।
तिनका भी जमीन ना देने की बात
किंतु प्यार से समझाने के बाद भी जब दुर्योधन ने श्रीकृष्ण का अपमान किया। उन्हें बंदी बनाने की बात कही, तब जय श्री कृष्ण ने अपने अवतार को प्रकट किया और सुदर्शन चक्र धारण कर लिया। जिससे पूरी सभा में त्राहिमाम मच गया और महाभारत की शंखनाद हो गया।
हालांकि लोगों की काफी, अनुनय-विनय करने के बाद, श्री कृष्ण ने अपनी सेना तो दुर्योधन यानी कौरवों को दे दी। किंतु स्वयं पांडवों और अर्जुन के साथ हो लिए। इस युद्ध में तकरीबन पचास लाख से ज्यादा सैनिकों ने भाग लिया। आप यह कह सकते हैं कि लगभग उस वक्त के सभी राजाओं ने इस युद्ध में भाग लिया। किंतु इनमें से 2 लोग ऐसे थे जिन्होंने इसमें सम्मिलित होने से स्वयं और विश्व की हानि को समझा।
विश्व की हानि
इनमें श्री कृष्ण के भाई बलराम जो जानते थे, कि भगवान श्री कृष्ण के बारे में, महाभारत की रचना करना एक साधारण परिकल्पना है। उनका किसी भी तरफ से जाना चाहे, वह पांडवों की तरफ से हो या फिर कौरवों की तरफ से व्यर्थ ही होगा। जिसकी कोई भी जरूरत नहीं होगी।उनके अलावा एक और राजा थे जिन्होंने इस युद्ध में भाग लेना उचित नहीं समझा:
1 दिन भगवान श्री कृष्ण के पास, जब महाभारत की युद्ध की घोषणा हुई। तो सभी राज्यों के राजा अपनी अपनी तथ्यों और मत के साथ अपना अपना पक्ष तय कर रहे थे। कि वह किस तरफ जाएंगे या तो कर्मों की तरह या तो पांडवों के साथ इसी दौरान कई ऐसे भी राजा थे। जिन्होंने यह तय किया कि वह दोनों की तरफ से नहीं लड़ेंगे, बल्कि अगर कभी ऐसी स्थिति आती है।
कि किसी दिन उन्हें स्वयं के लिए युद्ध करना पड़े तो वह अपना पक्ष तय करेंगे। इन राजा में से एक उड़ीपी के राजा थे। जो चाहते थे और यह समझते थे कि यह लड़ाई दो भाइयों के बीच की लड़ाई है। उनका मत और उनकी समझ के कारण यह युद्ध हो रहा है। जिसकी कोई आवश्यकता नहीं है। ऐसे मे, अपना मत और अपना पक्ष समझाने के लिए श्री कृष्ण के पास जाते हैं और कहते हैं:
कि किसी दिन उन्हें स्वयं के लिए युद्ध करना पड़े तो वह अपना पक्ष तय करेंगे। इन राजा में से एक उड़ीपी के राजा थे। जो चाहते थे और यह समझते थे कि यह लड़ाई दो भाइयों के बीच की लड़ाई है। उनका मत और उनकी समझ के कारण यह युद्ध हो रहा है। जिसकी कोई आवश्यकता नहीं है। ऐसे मे, अपना मत और अपना पक्ष समझाने के लिए श्री कृष्ण के पास जाते हैं और कहते हैं:
श्री कृष्ण के पास:
हे श्री कृष्ण, मैं आप जैसे महान परमेश्वर को मैं प्रणाम करता हूं। आप सभी के पालनहार और सबके मन की व्यथा को समझने वाले हैं मैं इस वक्त बहुत ही वह को की स्थिति में हूं क्योंकि मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि दोनों भाइयों की तरफ में से मैं किसके साथ जाऊं जबकि मैं यह नहीं चाहता कि मैं युद्ध में में शामिल हूं लेकिन मेरे पास इस युद्ध के लिए एक सुझाव है
यह सुनते ही श्रीकृष्ण मुस्कुराए और ही उड़ी पीके दक्षिणावर्ती महान राजा मैं जानता हूं कि आप इस युद्ध में शामिल नहीं होना चाहते लेकिन आपका राजस्व धर्म यह कहता है कि आप इस युद्ध में शामिल हो इसीलिए आप यहां आए हैं अगर आपके पास किसी तरह का सुझाव है तो कृपया मुझे बताइए
ऐसा कहते ही उड़ी पीके राजा मुस्कुराने लगे और उन्होंने कहा ही श्रीकृष्ण आप जानते हैं कि इस युद्ध में लाखों लाख लोग आमने-सामने होंगे और जब वह शाम को थक कर के अपने विश्राम हाल है में जाएंगे तो उससे उन्हें भूख की पीड़ा के कारण असहनीय दर्द होगा जो मैं समझता हूं और कल्पना करता हूं कि यह अत्यंत पीड़ा कारक होगा
इसीलिए इतने सारे लोगों की भोजन की व्यवस्था करने के लिए भी एक बहुत बड़ी सेना की आवश्यकता होगी और मैं अपनी सेना इसी कार्य में लगाना चाहता हूं कि मैं प्रतिदिन इतने सारे महान आत्माओं का तृप्ति करण कर सकूं यह मेरे लिए बहुत ही आदर और सम्मान का भाव होगा हम दक्षिणावर्ती राजा हैं और किसी को भी खाली पेट नहीं रहने देते इसलिए भोजन की जिम्मेदारी आप कृपया मुझे दें
ऐसा सुनते श्री कृष्ण गदगद हो उठे और उन्होंने कहा कुड़ी पीके राजा आप अत्यंत महान है आप जानते हैं कि आपको क्या करना है मैं तहे दिल से और बड़ी ही हर्षोल्लास के साथ आपको इस चीज के लिए सहयोग प्रदान करने की भरपूर कोशिश करूंगा
इसी प्रकार से महाभारत का युद्ध शुरू हो गया और प्रतिदिन 50000 या उससे ज्यादा के सैनिक मारे जाने लगे लेकिन यह बड़ी ही आश्चर्य की बात होती थी कि प्रतिदिन सारे के सारे सैनिक भरपेट भोजन कर पाते थे चाहे अगले दिन कितने ही सैनिकों की हानि क्यों ना हो अन्य का एक दाना भी नहीं बचता था
इस प्रकार महाभारत की युद्ध के दौरान जब 18 दिन बीत गए और जब युधिष्ठिर ने राज्य भार संभालने के लिए अपना राज्य अभिषेक का दिन चुना और उनका राज्याभिषेक हुआ इसके बाद उन्होंने तुरंत ही उड़ी पीके राजा के पास जाकर उनके पैर छुए और पूछा कि ही राजन इन आखिरी 18 दिनों में लगातार सैनिकों की हानि होती रही किंतु आप फिर भी इतनी विशाल सेना की पेट पूजा कराते रहे और किसी भी तरीके से भोजन की कमी नहीं हुई जबकि लाखों सैनिक रोज या तो वीरगति को प्राप्त हो जाते थे यह और जुड़ जाते थे कृपया इसका रहस्य क्या है मुझे बताएं
इस पर उड़ी पीके राजा ने पूछा आप अपनी इस विजय का श्रेय किसे देते हैं तो इस पर युधिष्ठिर ने बड़ी ही शालीनता और साधारण सभा में कहा कि इस युद्ध के विजय का पूरा श्रेय शिवाय श्री कृष्ण के किसी और को नहीं जा सकता उसी वक्त उड़ी पी ने कहा कि जिस प्रकार परमात्मा श्री कृष्ण इस पूरे महाभारत के रचयिता है उसी प्रकार इस भोजन व्यवस्था की भी संकल्पना उन्होंने ही की और उन्होंने ही मार्गदर्शन किया
इस पर युधिष्ठिर नहीं आ पूछा कि आप कैसे जान जाते थे कि युद्ध के बाद केवल यथासंभव इतनी ही सैनिक बचेंगे और आप केवल उनके लिए ही खाना बनाते थे इस पर उड़ी पी ने कहा मैं हर रोज श्री कृष्ण के पास मूंगफली या लेकर जाता था जितनी मूंगफली के दाने श्रीकृष्ण खाते थे उसके 1000 गुना सैनिक कम हो जाते थे अर्थात अगर श्रीकृष्ण उस रात्रि को 50 मूंगफली खाते थे तो अगले दिन 50000 सैनिकों की मृत्यु हो जाती थी और मैं समझ जाता था कि अगले दिन मुझे कितने लोगों का भोजन तैयार करना है इसी प्रकार से मैंने कुल 18 दिन श्रीकृष्ण की मार्गदर्शन से इस कार्य को पूर्ण किया इसलिए ऐसा राष्ट्रीय मातृ श्री कृष्ण भगवान को ही जाता है
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें