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बिना सुने मेरा पक्ष - हेमराज सिंह 'हेम' की कविता

अर्धांगिनी?? नारी व्यथा!

...............


बस ! यहीं तक था तेरा साथ?
बस ! रूप मर्दन तक सिमट कर रह गयी
तेरी चाहत,
यौवन से प्लावित सरि में तैरना भर था तेरा,
मेरी इच्छा जाने बिना।

मेरे अधर तेरी प्यास मिटाने तक सिमट गये,
और मेरा वक्ष दलित द्राक्षा सा
जिसे कुचलकर भरा तूने अपना मदिरा पात्र।

मेरा तन केवल क्रीड़ांगन था तेरे लिए,
बस क्रीड़ा कौतुक भर,
जहाँ खेल जाता था तू देर-सवेर,
निशा- वासर वासना की जाजम पर,
हर बार विजेता घोषित कर ,खुद ही खुद को।

क्या सोच कर आयी थी मैं
क्या सोच कर फंसी थी तेरी मोहपाश में,
सुख दुख में बराबर की भागीदार बन,
पर तूने मुझे माना,
सिर्फ व सिर्फ रति प्रदेश,
जहाँ भ्रमण कर सके तू,
काम रूपी अश्व पर सवार हो
यही तो किया तूने,
हर सुनहरी सुबह व स्याह रात में।

हर बार सुनाया फैसला मेरे खिलाफ
अपने स्वर्ण सिंहासन पर बैठकर
बिना सुने मेरा पक्ष।

मैं चुनती रही हर सुगन्धित सुमन,
प्रेम वन में,
गूंथती रही कुसुम माला तेरे वक्ष पर सजाने को,
रचती रही नित नया संगीत अपनी,
हृदय वीणा को कस कर।

और तू ?
दौड़ता रहा मेरे कांतिवन में,
दमन करता मेरी हर अभिलाषा,
कुचलता मेरी हर महत्वकांक्षा,
तोड़ता रहा मेरा विश्वास
वासनाग्रस्त हो।

पर मैं!!
सब सह कर भी करती रही
प्रार्थना,
तेरे प्राणो की रक्षा की,
समझ कर प्राणवलभ,
पर तू! सब भूल तोड़ता रहा
मेरा हर प्रण निर्दयी बन।

जब उजड़ गया मेरा कुसुमागार
सूख गयी यौवन सरि,
रित गया अधरामृत,
विलग गयी कांति,
न रहा रक्तिम वर्ण,
झड़ गया केश कुंज,
मिट गयी सब उपमाएं

लोट गया तू
छोड़ कर मुझे वीराने में।
किसी और उपवन की तलाश में
भूल कर उस अर्थ को,
कहा था तूने अग्निकुंड
के सामने
पकड़कर मेरा हाथ .. अर्धांगिनी!!

हेमराज सिंह 'हेम'
कोटा, राजस्थान

भावार्थ:

कवि अपनी इस कविता में बहुत ही मार्मिक तरीके से अर्धांगिनी यानी पत्नी की कथा के बारे में बताना चाहता है.

अपनी पत्नी के दर्द को बहुत ही करीब से देखने के बाद एक नारी की व्यथा को कविता के रूप में  संकल्प करते हुए कवि ने  लिखा है कि:

नारी अपनी व्यथा कहते हैं वह कहती है कि क्या हमारा तुम्हारा साथ केवल जिस्मानी था.  क्या मैं सिर्फ  तुम्हारे और अपने यौवन की प्यास बुझाने भर की इच्छा मात्र ही थी?

क्या तुमने कभी भी मेरे मन की इच्छा जानने की कोशिश की कि मैं क्या चाहती हूं?

मेरे होंठ तुम्हारे मन की प्यास मिटाने के लिए यही तक थी,  क्या मेरा शरीर तुम्हारे लिए बस एक खेलने की चीज भर था या फिर वासना का एक ऐसा दरिया जहां पर तुम हर बार अपने आप को विजेता खुद ही घोषित कर लेते थे?


 नारी अपने परिवार से ससुराल में आने की कहानी की व्यथा को वर्णित करती है:


 कि मैं क्या सोच कर के आई थी,  क्यों मैं तुम्हारे पास में बंध गई,  क्यों मैंने  तुम्हारे सुख दुख में खुद को साझेदार बना लिया?


 मैंने तो तुम्हारे लिए इतनी सारी चीजों की कुर्बानियां की लेकिन तुमने सिर्फ मुझे एक ऐसा जरिया माना जिससे कि तुम अपने तन बदन की प्यास को मिटा  सको.


 मेरी इच्छा है कि तुम कभी मेरे मन  की अभिलाषा को जानो,  मेरे बारे में कुछ कविताएं कुछ कहानियां  कहो,  मेरे अच्छे- मेरे बुरे के बारे में  जानने की कोशिश करो.  इससे ज्यादा मुझे तुमसे किसी भी प्रकार की चाहत नहीं है क्या तुम इतना मेरे लिए कर सकते हो.


 मैं एक अबला नारी जो कहती हूं तुम्हारी अर्धांगिनी क्या तुम मेरे  इस इच्छा को पूरा कर सकते हो?


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