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जीने मरने के वादे - प्राची मिश्रा की कविता (स्लोगन)

 
जीने मरने के वादे

जीने मरने के वादे

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किये थे साथ जीने मरने के वादे
वो अब नज़रें मिलाने से भी डरते हैं,
जो बसाने चले थे दुनिया नई
वो अब मेरी के भी आने से डरते

प्राची मिश्रा

कवित्री प्राची मिश्रा अपनी कविता में कहती हैं,   कि किसी अपने हाथ से हमने जीने मरने के वादे हजार कर डाले.  लेकिन आज एक ऐसी नौबत आई है जो तुमसे नजरें मिलाने से भी डर लगता है.

जिनके साथ हम दुनिया बसाने चले थे,  अब वह हमसे इतनी नफरत करते हैं क्यों मेरी जन्नत के सफर पर आने से भी इंकार कर देते हैं.

कवित्री के द्वारा यह बयान की गई कैसी दर्द भरी दास्तां है जो कि दो प्रेमियों के बीच में उनके जीने मरने के बाद है और उनके विश्वास के ऊपर सच है.

कवित्री कविता में यह कहा गया है कि दो प्रेमियों के बीच में विश्वास सबसे बड़ी दूर है.  यदि टूट जाती हैं तो आप अपने सबसे करीबी से मिलने की भी कोशिश नहीं कर पाते.

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